डॉ. पीयूष भादविया
सहायक आचार्य
इतिहास विभाग, मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर, राजस्थान ।
peeyush.bhadviya@gmail.com
9001291980
मोहित शंकर सिसोदिया सीनियर रिसर्च फैलो एवं शोधार्थी
इतिहास विभाग, मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर, राजस्थान ।
mohitshankarsisodia@gmail.com
7597638677
शोध सारांश
श्री विजय शान्तिसूरीश्वरजी महाराज साहब ने स्वयं पशुपालक जाति से जैन धर्म में दीक्षित होकर आबू पर्वत को अपनी तप साधना का केन्द्र बनाया, जहां ब्रिटिशकाल में राजपूताने एवं गुजरात के शासकों का तांता लगा रहता था। जब शासक वर्ग इनके सम्पर्क में आये तो उन्होने ओजस्वी उपदेशों से जीवदया का कल्याण मार्ग दिखलाया जिसको शासक वर्ग ने स्वीकार्य किया और प्रजा ने भी इसका अनुकरण किया। भारतीय एवं विदेशी जिस भी धर्म के मानने वाले इनके सम्पर्क में आये वे सभी इनके दिखाये मार्ग पर चलने लगे। गायों के लिए गौशालाएं कबूतरों के लिए चबूतरे पशुओं के लिए चिकित्सालय, तालाब आदि इनकी प्रेरणा स्वरूप निर्मित हुए। देवस्थानों पर कुरीति स्वरूप पशु बलियों दी जा रही थी, उन पर रोक लगवाई। शान्तिविजयजी के जीवन के कृत्य एवं विचार तत्कालीन समय के साथ-साथ वर्तमान के संदर्भ में प्रासंगिक एवं दूरगामी सिद्ध हो रहे है।
जैन दर्शन के आयामों की शिक्षा गुरू (जैन साधु / आचार्य) अपने शिष्यों / श्रावकों / अनुयायियों तक पहूंचाते आये है। यह परम्परा पारस पत्थर के समान है, मानव के अंहकारमय जीवन से विवेकपूर्ण जीवन की ओर अग्रसर होता है, चूंकि 84 जन्मों में से एक मानव जीवन है, जो विवेक के कारण सर्वश्रेष्ठ है, तो वह स्वयं वन्य जीवों की भांति हिंसक कैसे हो सकता है अतः उसे विश्व के जीवों के प्रति कल्याणकारी सभावना रखनी चाहिए। वर्तमान आधुनिक अतिभौतिकवादी मानव अपने जीवन प्रत्त्यशा की बात करता है परन्तु वह भूल जाता है कि इस पृथ्वी की संतान केवल मानव ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण जीव-जन्तु-वनस्पति भी है, जिनमें आपस में भातृत्व का सम्बन्ध भी होना आवश्यक है। हम में विवेक है तो हमें सभी के कल्याण की पहल करनी चाहिए।
जैन आचार्य श्रीमद् विजय शान्तिसूरीश्वर महाराज साहब के जीव कल्याण के प्रति कृत्य एवं विचार
संकेताक्षर: शान्तिविजयजी, जीवदया अहिंसा, विवेकपूर्ण जीवन ।
जैन धर्म अहिंसा, परोपकार, करुणा, दया, प्रेम एवं त्याग के आयामों को लेकर चला, जहां मानव ही नहीं प्राणी एवं प्रकृति के लिए भी घनिष्ठता की दृष्टि दिखती है। 22 वें तीर्थंकर भगवान नेमीनाथ के जीवन चरित्र दर्शन में पाते है कि विवाह करने जाते वक्त गौवंश की करूणामयी पुकार सुन उनमें वैराग्य पथ जागृत हो जाता है चालुक्य राजा कुमारपाल ने अपने गुरू हेमचन्द्राचार्य से इसी मार्ग का ज्ञान प्राप्त कर मूषक नगर, जू नगर, गौशालाओं आदि का निर्माण करवाया।
जैन धर्म के किसी भी पंथ का साधु, जीवन का प्रत्येक क्षण इसी विचार को लेकर जीवनयापन करता है, जिसमें नंगे पैर चलना जिससे पथ पर किसी सूक्ष्म जीव को कोई कष्ट न हो; आहार में विभिन्न त्यागों को रखना; बोलते समय कपडा या रूमाल मुंह के आगे लगाना जिससे अतिसुक्ष्म जीव को कोई कष्ट न हो; चार्तुमास या वर्षाकाल में विहार न कर एक स्थान पर रहना उपाश्रयों में विद्युत सुविधा आज भी न होना बैठते समय सूत के धागे से बने ओघा से स्थान को साफ करना, जैसे कई उपायों को अपनी साधु जीवन शैली में सम्मिलित कर वे प्राणी मात्र पर दया की भावना का पुरजोर समर्थन कर लोकजीवन को इस पथ पर चलने का अनुग्रह प्रदान करते है।
भगवान आदिशिव, पशुपति बन समस्त प्राणियों के देवता के रूप में हमेशा से पूजनीय है। जिन्होंने जीव एवं प्रकृति को एक दृष्टि से देखा है अर्थात् सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार माना है। जिससे द्वैतवाद से अद्वैतवाद की ओर जाने वाला मार्ग प्रतिपादित होता है। आदिमानव से सभ्य मानव के निर्माण या विकास में पशुपालन महत्वपूर्ण कार्य था । वैदिक काल में पशु सम्पदा के लिए ही कई युद्धों की चर्चा देखने को मिलती है। आधुनिक दुनिया से पहले के इतिहास को देखने पर हमें प्रत्येक प्राणी की महत्ता का विस्तृत अध्ययन करने को मिलता है। जबसे हमें पशुओं की आवश्यकता कम लगने लगी तभी से ही हम अतिभौतिकवादी बन प्रकृति एवं पशु-पक्षियों की भी इस पृथ्वी को नष्ट करने में लगे है।
जैन धर्म कई पंथों में विभाजित है, जिसमें से राजस्थान के जालोर एवं सिरोही जिले में श्वेताम्बर पंथ का शुरूआत से ही बोलबाला रहा है। श्वेताम्बर पंथ, गुरू-शिष्य परम्परा की दृष्टि से कई गच्छों में विभक्त है। तपगच्छ या तपागच्छ या तपोगच्छ प्राचीन गच्छ परम्परा है, जो 84 गच्छों में से सबसे बड़ा गच्छ है। जिसके जैन साधुओं ने अपने तप या ध्यानस्थ साधना से परम कल्याण मार्ग को सुशोभित किया है। कई वर्ण एवं वर्ग के लोग जैन धर्म में दीक्षित होकर जैन आचार्य बने तथा उन्होंने जैन धर्म की पताका को ओर अधिक व्यापक बनाया है।
राजस्थान राज्य के जालोर जिले में जालोर – भीनमाल राज्य मार्ग पर कस्बा माण्डोलीनगर, रामसीन उपतहसील मुख्यालय से लगभग 5 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। माण्डोलीनगर में गुरूदेव योगी आचार्य श्री विजय शान्तिसूरीश्वर का मंदिर है। माण्डोली के दादागुरू गुरू शिष्य की तिकड़ी ने एक पशुपालक जाति में जन्म लेकर जैन धर्म में साधु बनकर नये आयामों को स्थापित किया है।
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