मोहित शंकर सिसोदिया
सीनियर रिसर्च फैलो एवं शोधार्थी, इतिहास विभाग मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर, राजस्थान ।
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भारत के हर कोने-कोने में कई सदियों से मंदिरों का निर्माण होता रहा है। ये मंदिर जहां भी निर्मित हुए उस नगर या स्थान के महात्मय के साथ-साथ वैभव, शिल्प, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं विभिन्न आख्यानों के विषय की चर्चा होती रही है। प्रारम्भ में प्रतिमाओं का विकास हुआ, फिर चबुतरों के आकार के स्थानों का फिर छोटे शिखरनुमा मंदिरों का, फिर शिखर के मण्डपों का इस तरह भव्य मंदिरों के साथ मंदिरों की श्रृंखला का जो आगे चलकर तीर्थ कहे जाने लगे। हमें प्राचीन नगरों के साथ-साथ तीर्थों का परिदृश्य देखने को मिलता है। नगर तीर्थ और जल संसाधन, इन तीन आयामों से भारत में कई साम्राज्य व्यवस्थाओं का पता चलता है शिल्पियों के गहन अध्ययन, अभियांत्रिकी एवं कौशलता का अनूपम स्वरूप हमारे प्राचीन देवालय है जो मील के पत्थरो की भांति भारत के स्वर्णित युग को संभाले है। प्राचीनकाल में मंदिरों का निर्माण शासकों, धनकुबेरों, सार्थवाहों आदि ने निर्मित करवाये। मंदिरों के निर्माण में धार्मिक के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिप्रेक्ष्य दृष्टिगोचर होते है।’
वर्तमान का भीनमाल उपखण्ड श्रीमालनगर, श्रीमालपुर, श्रीनगर, रत्नमाल, पुष्पमाल, फूलमाल, सिंधुराजपुर, आलमाल, पोपमाल, भीलमाल, भिल्लमाल आदि के अलावा हवेनसांग (7वीं शताब्दी) ने अपने प्रसिद्ध वृतान्त सी यू की में भीनमाल को “पि-लो-मो-लो” (समृद्धि का नगर ) चीनी भाषा में कहा है तथा अरबी भाषा की पुस्तक “फुतूह अल-बुलदान” (9वीं शताब्दी) में भीनमाल का नाम अल-बलमान मिलता है। इस प्रकार भीनमाल कई नामों से जाना पहचाना जाता रहा है। प्राचीन गुजरात या गुर्जर प्रदेश की राजधानी रहने का गौरव प्राप्त है और त्रिपक्षीय गुट संघर्ष के काल में भीनमाल से उज्जैन जाने वाले मार्ग तक गुर्जर प्रतिहार या मारू स्थापत्य शैली का विस्तार किया एवं वैभव को बढाया है । श्रीमाली ब्राह्मणों के साथ-साथ ओसवाल या उपकेश, पोरवाल या प्राग्वाट एवं धनोत्कटाव वंशों का मूल स्थान है। महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त, संस्कृत के महाकवि माघ एवं जैन विद्वान सिद्धर्षि गणि जैसे अनेकों महामानवों की जन्म और कर्मस्थली रहा है। प्राचीन ग्रन्थों में कूर्म पुराण, स्कन्द पुराण, श्रीमाल पुराण, निशीथ चूर्णि, प्रबंध चिंतामणि, कुवलयमाला, कान्हड़देव प्रबंध, विविध तीर्थ कल्प, रासमाला आदि के साथ-साथ विदेशी यात्रियों एवं लेखकों द्वारा विभिन्न कालक्रमों की जानकारी मिलती है। भीनमाल पर कई प्राकृतिक आपदाएं प्रमुख रूप से भूकम्प, अकाल एवं बाढ विभिन्न कालखण्डों में आई और कई मुस्लिम आक्रमण हुए जिससे भीनमाल का वैभव-समृद्धि को भारी क्षत्ति पहुंची। स्वर्णित युग, आज भी भूमिगत दिखाई देता है, विभिन्न समय में हुई खोज एवं पुरातत्त्वों की गवेषणा से जमीनदोस मंदिरों के अवशेष प्राप्त होते रहते है। अवशेषों में से प्राप्त कई मूर्तियों आज भी वाराहश्याम मंदिर में रखी गई है, जहां उनके दर्शन व पूजा नियमित रूप से होती है। मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की है तथा विभिन्न कालों की है, जिससे मंदिर किसी संग्रहालय स्वरूप लिये हुए है । भीनमाल श्रीमाली ब्राह्मणों एवं जाति की उत्पति स्थल होने से विभिन्न 14 गौत्रों के कुलदेवी – कुलदेवता, इसी क्षेत्र में विभिन्न मंदिरों में है। भीनमाल एवं जालोर जिले का एक भी देवालय, देवस्थान विभाग के अन्तर्गत नहीं आता है।
वेनसांग का विवरण
हर्षकालीन “तीर्थयात्रियों के राजकुमार” कहे जाने वाले चीनी यात्री हवेनसांग ने अपने प्रसिद्ध वृतान्त “सी यू की” में तत्कालीन भारतवर्ष के राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विन्यासो का वर्णन किया है तथा इस क्षेत्र से होकर यात्रा की थी तथा तत्कालीन परिदृश्यों का वर्णन किया है। क्षेत्र को गुर्जर प्रदेश के रूप में अपनी भाषा में “क्यिोचेलो” के रूप में पहचान की है। भीनमाल को गुर्जर प्रदेश की राजधानी बताया है तथा “पि–लो–मो–लो” अपनी भाषा में कहा है, जिसका हिन्दी अर्थ “समृद्धि का नगर” है। भीनमाल उनकी यात्रा पथ में दो बार आया है। उन्होंने लिखा है कि यहां हीनयान सम्प्रदाय का बौद्ध मठ था, जहां 50 भिक्षु थे तथा 50 से ज्यादा दुसरे धर्मों के देवालय होना बताया है।
वराह पुराण या वराह महात्म्य






